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क्या आंध्र प्रदेश बनेगा 'ग्रीन एनर्जी' का सऊदी अरब?

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NEHA TRIPATHI

Jan 18, 2026 • 53 Views

क्या आंध्र प्रदेश बनेगा 'ग्रीन एनर्जी' का सऊदी अरब?

 2014 में जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का बंटवारा हुआ, तो राज्य की आर्थिक स्थिरता को लेकर कई सवाल खड़े हुए थे। आंध्र प्रदेश ने अपना सबसे बड़ा राजस्व स्रोत, हैदराबाद खो दिया था, जो राज्य के राजस्व में 55% से 60% तक का योगदान देता था। लेकिन आज, आंध्र प्रदेश अपनी एक नई आर्थिक कहानी लिख रहा है और इस बार केंद्र में है— क्लीन एनर्जी (Clean Energy)

हरित ऊर्जा (Green Energy) वह ऊर्जा है जो प्राकृतिक, नवीकरणीय और पर्यावरण के अनुकूल स्रोतों से प्राप्त होती है। इससे प्रदूषण कम होता है और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद मिलती है।

हरित ऊर्जा के प्रमुख स्रोत

 सौर ऊर्जा (Solar Energy)

सूर्य की रोशनी से बिजली

सबसे तेजी से बढ़ने वाला ऊर्जा स्रोत

भारत में अपार संभावनाएँ

 पवन ऊर्जा (Wind Energy)

हवा की गति से बिजली उत्पादन

तटीय और पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक उपयोगी

 जल ऊर्जा (Hydropower)

बहते पानी से ऊर्जा

बड़े और छोटे बांधों से उत्पादन

जैव ऊर्जा (Biomass Energy)

फसल अवशेष, गोबर, जैव कचरे से ऊर्जा

ग्रामीण भारत के लिए बेहद उपयोगी

 भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal)

पृथ्वी की अंदरूनी गर्मी से ऊर्जा

भारत में सीमित लेकिन संभावनाएँ मौजूद

 'सऊदी अरब' से तुलना

 जिस तरह सऊदी अरब ने 'ऑयल' (तेल) के दम पर दुनिया में अपना दबदबा बनाया, आंध्र प्रदेश वही ट्रेंड ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में दोहराने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में राज्य में 10 बिलियन डॉलर के ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट की घोषणा की गई है, जिसका पहला चरण 2027 तक और पूर्ण परिचालन 2030 तक शुरू होने की उम्मीद है।

आर्थिक आंकड़े और निवेश का आकर्षण :

 आंध्र प्रदेश की विकास दर वर्तमान में काफी प्रभावशाली है। वित्तीय वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में राज्य ने 11.28% की वृद्धि दर्ज की है। इतना ही नहीं, वित्तीय वर्ष 2026 के पहले तीन क्वार्टरों में भारत में आए कुल निवेश का 25% हिस्सा अकेले आंध्र प्रदेश में गया है। रिलायंस, गूगल और टाटा पावर जैसी बड़ी कंपनियां अब विशाखापट्टनम और आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों को चुन रही हैं।

आंध्र प्रदेश ही क्यों? (भौगोलिक और नीतिगत कारक) :

 इस निवेश के पीछे कुछ ठोस कारण हैं:

  1. भौगोलिक लाभ: राज्य के पास 970 किलोमीटर की लंबी तटरेखा (Coastline) और गहरे पानी के बंदरगाह (Deep Water Ports) हैं, जो निर्यात को आसान बनाते हैं।
  2. ऊर्जा क्षमता: यहाँ 38 गीगावाट सोलर और 123 गीगावाट विंड एनर्जी की विशाल क्षमता है।
  3. नई नीति (Policy): 2024 की इंटीग्रेटेड क्लीन एनर्जी पॉलिसी के तहत सरकार ने अगले 5 वर्षों में 160+ गीगावाट क्लीन एनर्जी स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।

 आकर्षक प्रोत्साहन (Incentives) :

 निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने कई बड़े वादे किए हैं:

  • सोलर और विंड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने पर 25% तक की कैपिटल सब्सिडी
  • SGST का 100% पुनर्भुगतान (Reimbursement)
  • बिजली और ग्रिड शुल्कों में भारी कटौती।
  • सिंगल विंडो अप्रूवल ताकि प्रोजेक्ट्स में देरी न हो।

 बिज़नेस मॉडल और वैश्विक मांग

 यहाँ का मॉडल केवल बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि 'पावर से मॉलिक्यूल' (Power to Molecules) तक जाना है। हाइड्रोजन के बजाय ग्रीन अमोनिया पर ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि इसका परिवहन आसान है और उर्वरक व शिपिंग उद्योग में इसकी भारी मांग है। जर्मनी की कंपनी यूनिपर (Uniper) ने पहले ही काकीनाडा प्रोजेक्ट से ग्रीन अमोनिया खरीदने के लिए समझौता किया है, और जापान व दक्षिण कोरिया जैसे देश भी यहाँ निवेश की ओर देख रहे हैं।

 चुनौतियां और भविष्य (Challenges)

 हालांकि, राह इतनी आसान भी नहीं है। पानी की कमी (Water Stress), मांग की अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा (जैसे ऑस्ट्रेलिया और मिडिल ईस्ट से) बड़े जोखिम हैं। सबसे महत्वपूर्ण है नीतिगत स्थिरता (Policy Stability), ताकि सरकार बदलने पर निवेशकों का भरोसा न टूटे।

निष्कर्ष:

 यदि आंध्र प्रदेश 2030 तक ग्रीन हाइड्रोजन की लागत को $2 प्रति किलो से नीचे लाने में सफल रहता है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक 'गेम चेंजर' साबित होगा।

 

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