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जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच, ISRO ने अपने तीन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा मिशनों को खो दिया है

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SAURABH TRIPATHI

Jan 13, 2026 • 27 Views

जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच, ISRO ने अपने तीन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा मिशनों को खो दिया है

 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) दुनिया भर में अपनी सटीकता के लिए जाना जाता है, लेकिन पिछले कुछ महीने देश की रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताओं के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं। जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच, ISRO ने अपने तीन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा मिशनों को खो दिया है। आइए जानते हैं इन मिशनों की विफलता और उनके भारत पर प्रभाव के बारे में।

 ग्राफ़िक्स और फुटेज - विफल मिशनों का विवरण :

PSLV-C62 (जनवरी 2026): यह 2026 का पहला लॉन्च था, जिसका उद्देश्य 'EOS-N1' या 'अन्वेषा' सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करना था। यह DRDO द्वारा निर्मित एक हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट था जो पृथ्वी की सतह पर विभिन्न सामग्रियों की पहचान करने में सक्षम था। हालांकि, तीसरे चरण (Third Stage) के अंत में रॉकेट के पथ में विचलन देखा गया, जिससे यह मिशन और इसके साथ मौजूद 15 अन्य छोटे सैटेलाइट खो गए।

  • PSLV-C61 (मई 2025): इस मिशन में राडार इमेजिंग सैटेलाइट EOS-09 ले जाया जा रहा था, जो बादलों के पार भी देख सकता था। लेकिन लॉन्च के केवल छह मिनट बाद, तीसरे चरण के मोटर केस में चैंबर प्रेशर गिर जाने के कारण मिशन विफल हो गया।
  • GSLV-F15 (जनवरी 2025): यह नेविगेशन सैटेलाइट NVS-02 को ले जा रहा था। हालांकि रॉकेट ने अपना काम किया, लेकिन सैटेलाइट के ऑक्सीडाइज़र वाल्व में खराबी के कारण वह अपनी अंतिम कक्षा (Orbit) तक नहीं पहुँच सका और बेकार हो गया।

 विश्लेषण - विफलता के कारण और प्रभाव :

 यदि हम 2017 से 2026 के बीच के आंकड़ों को देखें, तो कुल 44 मिशनों में से 5 विफल रहे हैं और ये सभी मिशन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे। अन्य दो पुरानी विफलताओं में अगस्त 2021 का GSLV-F10 (क्रायोजेनिक चरण में वाल्व लीक) और अगस्त 2017 का PSLV-C39 (हीट शील्ड का अलग न होना) शामिल हैं।

 इन विफलताओं का प्रभाव गहरा है। अनुमान के मुताबिक, पिछले नौ वर्षों में इन विफलताओं से भारत सरकार को करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, इन स्वदेशी सैटेलाइट्स की कमी के कारण भारत को विदेशी कंपनियों से सैटेलाइट सेवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ जाते हैं।

 निष्कर्ष

 सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, हर विफलता एक अलग घटक या सिस्टम की खराबी के कारण हुई है। यह याद दिलाता है कि रॉकेट विज्ञान एक 'शून्य-त्रुटि' (zero-error) वाला क्षेत्र है, जहाँ एक छोटी सी चूक भी भारी नुकसान का कारण बन सकती है।

एंकर: हालांकि ये विफलताएं भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण सबक प्रदान करती हैं, लेकिन रणनीतिक क्षमताओं की तैनाती में देरी देश के लिए चिंता का विषय है।

एक सरल उदाहरण (Analogy):

 रॉकेट विज्ञान को एक जंजीर की तरह समझा जा सकता है। जिस तरह एक जंजीर की मजबूती उसकी सबसे कमजोर कड़ी पर निर्भर करती है, वैसे ही एक जटिल रॉकेट में हजारों कलपुर्जे होते हैं। यदि एक भी छोटा सा 'वाल्व' या 'सेंसर' (कड़ी) विफल हो जाता है, तो पूरा मिशन (पूरी जंजीर) टूट जाता है।

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